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17.8.10

धर्म धूरि कलि कलुष कुठारी.

                  श्री गंगा चालीसा                

जय जय जय जग पावनी जयति देवसरि गंग।
जय शिव जटा निवासिनी अनुपम तुंग तरंग।
जय जग जननी हरण अघ खानि आनंद करनी गंग महारानी।
जय भागीरथी सुरसरि माता कलि मल मल मूल दलिनि विख्याता।
जय जय जय हनु सुता अघ हननि भीषम की माता जग जननी।
धवल कमल दल सम तनु साजे लखि शत शरद चन्द्र छबि लाजे।
वाहन मकर विमल शुचि सौहे अमिय कलष कर लखि मन मोहे।
जडित रत्न कंचन ,आभूषण।हिय मणि हार हरण तम दूषण।
जग पावनी त्रय ताप नसावनी तरल तरंग तंग मन भावनि।
जो गणपति अति पूज्य प्रधान तिहुं ते प्रथम गंग अस्नाना।
ब्रह्मा कमंडल वासिनि देवी श्री प्रभु-पद पंकज सुख सेवी।
साठ सहस्र सगर सुत तारयो गंगा सागर तीरथ धार्यो।
अगम तरंग उठ्यो मन भावन लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन।
तीरथ राज प्रयाग अक्छवट धर्यो मात पुनि काशी करवट।
भागीरथ तप कियो अपारा दियो ब्रह्म तप सुरसरि धारा।
जब जग जननि चली हहराई शंभु जटा मंह रही समाई।
पुनि भागीरथ शंभुहि ध्यायो तब एक बूंद जटा से पायो।
ताते मातु भई त्रय धारा।मृत्युलोक ,नभ, अरु पातारा।
मृत्युलोक जान्हवी सुहावनि। कलिमल हरणि अगम जुग पावन।
धनि मैया तव महिमा भारी।धर्म धूरि कलि-कलुश कुठारी
नित नव सुख संपति लहैं धरें गंग को ध्यान
अंत समय सुरपुर बसैं सादर बैठि विमान
सम्वत भुज नभ दिशि राम जन्म दिन चेत
 पूरण चालिसा कियो हरि भक्तन हित नैत्र।
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