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छू ले जो मा की चौखट को, तो ज़र्रा भी सितारा हो जाए,दुर्गा भजन



छू ले जो मा की चौखट को, तो ज़र्रा भी सितारा हो जाए,
जहा ज़िक्र हो मा का मंगल हो,जन्नत का नज़ारा हो जाए
मैया के दर पर हर एक शक्ति आकर के शीश झुकती है
सारी दुनिया मा के दर्र पे लाखा कष्तो से मुक्ति पति है

सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
करती मेहेरबानिया, करती मेहेरबानिया

हो गुफा के अंदर मंदिर के अंदर
हो गुफा के अंदर मंदिर के अंदर
मा की ज्योता है नूरानिया
मा की ज्योता है नूरानिया
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
करती मेहेरबानिया, करती मेहेरबानिया

मैया की लीला कैसा पर्वत है नीला
मैया की लीला कैसा पर्वत है नीला
मेरी मैया की लीला कैसा पर्वत है नीला
कर्दे शेर च्चबीला ओह रंग जिसका है पीला
कर्दे शेर च्चबीला ओह रंग जिसका है पीला
कठिन चढ़ाइया मा सीढ़िया लाया
कठिन चढ़ाइया मा सीढ़िया लाया
ये है मैया की निशानिया
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
करती मेहेरबानिया, करती मेहेरबानिया

कोढ़ी को काया देवे निराधान को माया
कोढ़ी को काया देवे निराधान को माया
करती आँचल की च्चाया भिखारी बनके जो आया
करती आँचल की च्चाया भिखारी बनके जो आया
मा के द्वारे माइट संकट सारे
मिट जाए परेशानिया, मिट जाए परेशानिया
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
करती मेहेरबानिया, करती मेहेरबानिया

सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
सिर को झुका लो, शेरवाली को मना लो
चलो दर्शन पाओ मा के, करती मेहेरबानिया
करती मेहेरबानिया, करती मेहेरबानिया ||


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार




झूठे रिश्ते सारे झूठा परिवार माता,दुर्गा भजन




झूठे रिश्ते सारे झूठा परिवार माता

सब मतलब दे साथी इथे कोई ना मेरा है
जो साथ निभावे गा तेरे बिन केह्दा है
घरजा दे नाल करदे लोकी प्यार माता
तेरे बिन झूठा है ए संसार माता…….

इथे विषय विकारा दे बड़े चमेले ने
सब मोह माया दे पाए लगदे मेले ने
सुख मिलदा एक मिलदे दुःख हज़ार माता
तेरे बिन झूठा है ए संसार माता….

इथे हर कोई समजे खुद नु सयाना है
तेरी जाने ना भगती हरबंस निमना है
फड सोनू दी वी बाह ना विसार माता
तेरे बिन झूठा है ए संसार माता ||

तेरे बिन झूठा है ए संसार माता
झूठे रिश्ते सारे झूठा परिवार माता ||


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

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निकल न जाए हाथ से तेरे मौका ये अनमोल-दुर्गा भजन



निकल न जाए हाथ से तेरे मौका ये अनमोल
जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल

आके देख ले सजा दरबार अम्बे रानी का
सुख वरदानी का जग कल्याणी का
देती छप्पर फाड़ के मैया झोली ले तू खोल
जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल

कौन जाने कब नसीबा बदल जायेगा
जो नहीं था सोचा वो भी मिल जायेगा
करती चमत्कार मैया आँखे बंद खोल
जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल

निकल न जाए हाथ से तेरे मौका ये अनमोल
जय माता दी बोल बंदे जय माता दी बोल ||

बोल साचे दरबार की जय |


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार



लट खोल के नाचो मेरी माँ,



लट खोल के नाचो मेरी माँ,

की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ,

की नैना रतन जड़े,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

की टिका गिर ना पड़े,

की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ,

की नैना रतन जड़े,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

की हरवा गिर न पड़े की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

की कंगन गिर न पड़े की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ, नैना रतन जड़े,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

की पायल गिर न पड़े की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ, नैना रतन जड़े

लट खोल के नाचो मेरी माँ, नैना रतन जड़े

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

धीरे धीरे नाचो मैया होले होले नाचो,

की चुनर गिर न पड़े की नैना रतन जड़े,

की चुनर गिर न पड़े की नैना रतन जड़े,

लट खोल के नाचो मेरी माँ, नैना रतन जड़े



जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी





राग: जंगला ताल


जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी
अशुभ विदारिणी मात भवानी ।। टेक ।।


आदि शक्ति परब्रह्म स्वरूपिणी
जगजननी चहुँ वेद बखानी ।।१।।
ब्रह्मा शिव हरि अर्चन कीनो
ध्यान धरत सुर नर मुनि ज्ञानी ।।२।।
अष्टभुजा कर खंग बिराजे
सिंह सवार सकल वरदानी ।।३।।
बह्मानंद शरण मे आयो
भव भय नाश करो महारानी ।।४।।



प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मूत्र समस्या का बिना आपरेशन 100% समाधान

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि


श्री सन्तोषी माता चालीसा




दोहा

श्री गणपति पद नाय सिर, धरि हिय शारदा ध्यान.

सन्तोषी माँ की करुँ, कीरति सकल बखान.

चौपाई

जय संतोषी माँ जग जननी, खल मति दुष्ट दैत्य दल हननी.

गणपति देव तुम्हारे ताता, रिद्धि-सिद्धि कहलावहं माता.

मात-पिता की रहो दुलारी, कीरति केहि विधि कहूँ तुम्हारी.

क्रीट मुकुट सिर अनुपम भारी, कानन कुण्डल की छवि न्यारी.
सोहत अंग छटा छवि प्यारी, सुन्दर चीर सुन्हरी धारी.
आप चतुर्भुज सुघड़ विशाला, धारण करहु गले वन माला.
निकट है गौ अमित दुलारी, करहु मयूर आप असवारी.
जानत सबही आप प्रभुताई, सुर नर मुनि सब करहिं बढ़ाई.
तुम्हरे दरश करत क्षण माई, दुख दरिद्र सब जाय नसाई.
वेद पुराण रहे यश गाई, करहु भक्त का आप सहाई.
ब्रह्मा ढ़िंग सरस्वती कहाई, लक्ष्मी रुप विष्णु ढ़िंग आई.
शिव ढ़िंग गिरिजा रुप बिराजी, महिमा तीनों लोक में गाजी.
शक्ति रुप प्रकट जग जानी, रुद्र रुप भई मात भवानी.
दुष्ट दलन हित प्रकटी काली, जगमग ज्योति प्रचंड निराली.
चण्ड मुण्ड महिशासुर मारे, शुम्भ निशुम्भ असुर हनि डारे.
महिमा वेद पुरानन बरनी, निज भक्त के संकट हरनी.
रुप शारदा हंस मोहिनी, निरंकार साकार दाहिनी.
प्रकटाई चहुंदिश निज माया, कण कण में है तेज समाया.
पृथ्वी सूर्य चन्द्र अरु तारे, तव इंगित क्रम बद्ध हैं सारे.
पालन पोषण तुम्ही करता, क्षण भंगुर में प्राण हरता.
बह्मा विष्णु तुम्हें निज ध्यावैं, शेश महेश सदा मन लावें.
मनोकामना पूरण करनी, पाप काटनी भव भय तरनी.
चित्त लगाय तुम्हें जो ध्याता, सो नर सुख सम्पत्ति है पाता.
बन्ध्या नारि तुमहिं जो ध्यावै, पुत्र पुष्प लता सम वह पावैं.
पति वियोगी अति व्याकुल नारी, तुम वियोग अति व्याकुलयारी.
कन्या जो कोई तुमको ध्यावैं, अपना मन वांछित वर पावै.
शीलवान गुणवान हो मैया, अपने जन की नाव खिवैया.
विधि पूर्वक व्रत जो कोई करहीं, ताहि अमित सुख सम्पत्ति भरहीं.
गुड़ और चना भोग तोहि भावै, सेवा करै सो आनन्द पावै.
श्रद्धा युक्त ध्यान जो धरहीं, सो नर निश्चय भव सों तरहीं.
उद्यापन जो करहि तुम्हारा, ताको सहज करहु निस्तारा.
नारि सुहागिन व्रत जो करती, सुख सम्पत्ति सों गोद भरती.
जो सुमिरत जैसी मन भावा, सो नर वैसो फ़ल पावा.
सोलह शुक्र जो व्रत मन धारे, ताके पूर्ण मनोरथ सारे.
सेवा करहि भक्ति युक्त जोई, ताको दूर दरिद्र दुख होई.
जो जन शरण माता तेरी आवै, ताकै क्षण में काज बनावै.
जय जय जय अम्बे कल्याणी, कृपा करौ मोरी महारानी.
जो यह पढ़ै मात चालीसा, तापे करहिं कृपा जगदीशा.
निज प्रति पाठ करै इक बारा, सो नर रहै तुहारा प्यारा.
नाम लेत ब्याधा सब भागे, रोग दोश कबहूँ नही लागे.
दोहा
सन्तोषी माँ के सदा बन्दहुँ पग निश वास.
पुर्ण मनोरथ हों सकल मात हरौ भव त्रास.

*किडनी फेल रोग का अचूक इलाज* 

छोटे वक्ष को उन्नत और सूडोल बनाएँ

थकान दूर करने के उपाय

नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार



हे अम्बे बलिहारी लगे सबको तू प्यारी

मैया जी अस्सी नौकर तेरे


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हाँ मैया जी अस्सी नौकर तेरे ।
सेवा तेरी दे विच्च खड़ा रहा रवां मैं शाम सवेरे ॥

दोवे हत्थ बन्न मैया पैर च खालो लवा,
दुनिया नु छड मैया तेरा ही मैं हो लवा।
जद दी कित्ती नौकरी तेरी, भाग जाग पए मेरे,
हाँ मैया जी अस्सी नौकर तेरे॥

भवन दे वेहड़े तेरे देवां मैं बुहारियाँ,
पालकां दे नाल पुन्झां पौडिया प्यारिया।
सेवक नू सेवा बक्शो मैं पावां फेरे,
हाँ मैया जी अस्सी नौकर तेरे॥

सर मेरे ते टोकरी, असां कित्ती मैया दी नौकरी
ते हूँ मेनू दस्सेओ वे भगतो शेरां वाली डा डेरा
गल मेरे विच्च माला, घर मैया डा कर्मा वाला
ते हूँ मेनू दस्सेओ वे संतो शेरां वाली डा डेरा
हत्थ मेरे विच्च छैना, आपां मैया दी चरनी रहना
ते हूँ मेनू दस्सेओ वे भगतो शेरां वाली डा डेरा
नौकर तेरे चाकर तेरे


किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार









भगतो को दर्शन दे गयी रे एक छोटी सी कन्या


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भगतो को दर्शन दे गयी रे एक छोटी सी कन्या
छोटी सी कन्या, एक छोटी सी कन्या

भक्तो ने पुछा मैया नाम तेरा क्या है
वैष्णो नाम बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो ने पुछा मैया धाम क्या है
परबत त्रिकुट बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो में पुछा मैया सवारी तेरी क्या है
पीला शेर बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो में पुछा माँ प्रशाद तेरा क्या है
हलवा पूरी चना बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो में पुछा मैया श्रृंगार तेरा क्या है
चोला लाल बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो में पुछा मैया शस्त्र तेरा क्या है
त्रिशूल चक्र बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

भक्तो ने पुछा सबसे प्यारा तेरा क्या है
भक्तो का प्यार बता गयी रे एक छोटी सी कन्या

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि






देखो फिर नवरात्रे आये



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बही भक्ति की गंगा-यमुना, श्रद्धाओं के दीप जलाये।
देखो फिर नवरात्रे आये।

कोई माँ का भवन बुहारे, कोई तोरणद्वार सँवारे,
यज्ञ-हवन में लगे सभी ही, लगा रहे माँ के जयकारे।
भोग लगाता कोई माँ को, कोई चुनरी लाल चढ़ाये,
देखो फिर नवरात्रे आये।


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अम्बर कितना चमक रहा है, मातामय हो दमक रहा है,
मेघों का पानी भी जैसे, अमृत बनके छलक रहा है।
सूरज-चंदा और सितारों ने माता के मुकुट सजाये,
देखो फिर नवरात्रे आये।

फिरे पाप अब मारा-मारा, मिला धर्म को पुनः सहारा,
जगी ज्योत जैसे मैया की, दिव्य हुआ संसार हमारा।
आता-जाता हर क्षण मानो, मातारानी के गुण गाये,
देखो फिर नवरात्रे आये।


हिन्दू धर्म में हवन पूजा का उद्धेश्य और महत्व

भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्धों की जानकारी

आपकी आस्था कहीं अंधविश्वास तो नहीं?


उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ







उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो... जदों तेरा बुलावा आवे,
दिल दे तार हिलावे, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

चंगा लगदा मेरी माँ के सानु बड़ा चंगा लगदा
चंगा लगदा मेरी माँ के सानु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो... जदों बच्च्ड़े चदन चड़ाइयाँ,
करदे नेक कमाईयां, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

चंगा लगदा मेरी माँ के सानु बड़ा चंगा लगदा
चंगा लगदा मेरी माँ के सानु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो... जदों ठंडिआ चलन हवावां
कालिआं छान घटावां, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो... जदों भेटां गान दुलारे,
अम्मिये बोलें तेरे जयकारे, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

तेरे दर ते लगदे मेले, तेरे दर ते लगदे मेले
कंजक बन्न के तू खेले, मैनु बड़ा चंगा लगदा

तेरे दर ते वजदे नगाड़े, अम्मिये दर ते वजदे नगाड़े
नच्दे चन्न ते तारे, मैनु बड़ा लगदा मेरी माँ

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो... तेरा दर है जग तो निराला
देखे भागा वाला, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, तेरे चरना च कल्याणी
वग्गे गंगा दा पानी, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वाली माँ, हो.. तेरा नाम है अतुल प्यारा
सब दा तरन हारा, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा

उच्चेआ पहाड़ा वालिये मैया, जदों तेरा बुलावा आवे,
दिल दे तार हिलावे, मैनु बड़ा चंगा लगदा, मैनु बड़ा चंगा लगदा


पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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आज तेरा जगराता माता


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आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता,
जगमग करती पावन ज्योति, हर कोई शीश झुकाता।
माता माता माता माता...

आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता,
आज जगराता है, माँ का जगराता है।

माथे टीका, हाथ में चूड़ा, सर पे सोहे मुकुट सुनेहरा।
नैनो में है प्यार का अमृत, दिल ममता का सागर गहरा।
भक्त जानो से अम्बे तेरा बड़ा ही निर्मल नाता॥
माता माता माता माता...

आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता।
आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता॥

वैष्णो देवो को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
चिन्तपुरनी को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
ज्वाला माई को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
सो सो बार, सो सो बार, सो सो बार॥
आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता।
आज जगराता है, माँ का जगराता है॥

मेह्शासुर को मारने वाली, रक्तबीज संघारने वाली।
तू चामुंडा, तू रुद्रानी, खडग खप्पर धारने वाली।
काली तेरे रूप से तो काल भी घबराता॥
माता माता माता माता...

आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता।
आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता॥

नैना देवी को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
अम्बा रानी को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
मनसा देवी को प्रणाम करूँ मैं सो सो बार।
सो सो बार, सो सो बार, सो सो बार
आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता।
आज जगराता है, माँ का जगराता है॥

जिनके सर पे हाथ तुम्हारा तूफानों में पाए किनारा।
वो ना बहके वो ना भटके तू दे जिनको आप सहारा।
जहाँ पे तेरा हो जगराता, कष्ट वहां ना आता॥
माता माता माता माता...

आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता।
आज तेरा जगराता माता, आज तेरा जगराता॥

तेरे चोले लो प्रणाम भवानी सो सो बार।
तेरी पिण्डीओं को प्रणाम भवानी सो सो बार।
तेरे भक्तों को प्रणाम भवानी सो सो बार।
तेरी कंजकों को प्रणाम भवानी सो सो बार।
शेरा वाली माता तेरी सदा ही जय।
ज्योत वाली माता तेरी सदा ही जय।
संकट हरनी माता तेरी सदा ही जय।
मंगल करनी माता तेरी सदा ही जय।

सारे बोलो जय माता दी।
प्रेम से बोलो जय माता दी।
ऊँचे बोलो, जय माता दी।
जोर से बोलो, जय माता दी।
मिल के बोलो, जय माता दी।
भक्तो बोलो, जय माता दी।
संतो बोलो, जय माता दी।
जय माता दी, जय माता दी।

जयकारा ज्योति वाली दा, बोल सांचे दरबार की जय।
जय हो, जय हो॥


प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मूत्र समस्या का बिना आपरेशन 100% समाधान

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि




जगजननी जय जय माँ//Jag Janani Jai Jai Maa



जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

तू ही सत्-चित्-सुखमय, शुद्ध ब्रह्मरूपा।
सत्य सनातन, सुन्दर, पर-शिव सुर-भूपा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

आदि अनादि, अनामय, अविचल, अविनाशी।
अमल, अनन्त, अगोचर, अज आनन्दराशी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

अविकारी, अघहारी, अकल कलाधारी।
कर्ता विधि भर्ता हरि हर संहारकारी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

तू विधिवधू, रमा, तू उमा महामाया।
मूल प्रकृति, विद्या तू, तू जननी जाया॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

राम, कृष्ण, तू सीता, ब्रजरानी राधा।
तू वाँछा कल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

दश विद्या, नव दुर्गा, नाना शस्त्रकरा।
अष्टमातृका, योगिनि, नव-नव रूप धरा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

तू परधाम निवासिनि, महाविलासिनि तू।
तू ही शमशान विहारिणि, ताण्डव लासिनि तू॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

सुर-मुनि मोहिनि सौम्या, तू शोभाधारा।
विवसन विकट सरुपा, प्रलयमयी धारा॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

तू ही स्नेहसुधामयी, तू अति गरलमना।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि तना॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

मूलाधार निवासिनि, इहपर सिद्धिप्रदे।
कालातीता काली, कमला तू वर दे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

शक्ति शक्तिधर तू ही, नित्य अभेदमयी।
भेद प्रदर्शिनि वाणी विमले वेदत्रयी॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

हम अति दीन दुखी माँ, विपट जाल घेरे।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

निज स्वभाववश जननी, दयादृष्टि कीजै।
करुणा कर करुणामयी, चरण शरण दीजै॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥

जगजननी जय जय माँ, जगजननी जय जय।
भयहारिणी, भवतारिणी, भवभामिनि जय जय॥


पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि


तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले


होंगे ठाठ निराले तेरे होंगे ठाठ निराले ,
तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले ।

मनफरा से पैदल चलना, ना घोड़ा ना गाडी,
देख-देख थोड़ी दूरी पर माँ का धाम पहाड़ी,
हर साल निशान चढ़ाने का अब तू भी नियम बना ले ,
तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले ।

नवरातों में जिसने चढ़ी पहाड़ी धाम की सीढ़ी,
माँ की दया से मौज उड़ाती उसकी सातों पीढ़ी,
चढ़ जा पहाड़ी की सीढ़ी, अपनी तक़दीर बना ले,
तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले ।

लाल ध्वजा जब लाल उठाते , मईया खुश हो जाती,
खोल चुनड़ का पल्ला भगतों पर है प्यार लुटाती,
निशान पहाड़ी माँ का खोले किस्मत के ताले,
तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले ।

जिन हाथों ने ध्वजा उठायी वो तो हैं बड़भागी,
' सौरभ मधुकर ' उन्हें मिली है कृपा पहाड़ी माँ की,
हो गए वारे-न्यारे उनके हो गए वारे न्यारे,
तू भी इस नवराते में पहाड़ी माँ का निशान उठा ले ।




आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार


किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार



त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम


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त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम ,
महासती नारायणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।

रण प्रियाम बिरांग नाम गुर सहाय नन्दिनीम ,
सौभद्र-वाम अंगिनीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।
त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम ,
महासती नारायणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।

भक्त-वतसलाम सतिम , स्वास्ति रूप धारिणीम ।
सौभाग्य-वर प्रदायनीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।
त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम ,
महासती नारायणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।

गोयल सुताम , पति व्रताम , यवन दल विनाशिनीम ,
शत्रु-दाल विदारिणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।
त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम ,
महासती नारायणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।

त्रिशूल रूप धारिणीम , झुंझुनू निवासिनीम ,
महासती नारायणीम , नमामि सत-शिरोमणिम ।


तेरे दर को छोड़कर किस दर जाऊँ मैं

ॐ बोल मेरी रसना घड़ी घड़ी

शरण प्रभु की आओ रे यही समय है प्यारे

जय माँ वैष्णो देवी //Jai Maa Vaishno Devi | Vaishno Devi Aarti in Hindi with Lyrics | Bhakti ...



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जय माँ  वैष्णो देवी



वैष्णो माता आरती
!! जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता ,
हाथ जोड़ तेरे आगे, आरती मैं गाता,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! शीश पे छत्र बिराजे, मूरतिया प्यारी,
गंगा बहती चरनन, ज्योति जगे न्यारी,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! ब्रह्मा वेद पढ़े नित द्वारे, शंकर ध्यान धरे ,
सेवक चंवर डुलावत, नारद नृत्य करे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! सुंदर गुफा तुम्हारी, मन को अति भावे,
बार-बार देखन को, ऐ मां मन चावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! भवन पे झण्डे झूले, घंटा ध्वनि बाजे,
ऊंचा पर्वत तेरा, माता प्रिय लागे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! पान सुपारी ध्वजा नारियल, भेंट पुष्प मेवा,
दास खड़े चरणों में, दर्शन दो देवा ,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! जो जन निश्चय करके, द्वार तेरे आवे ,
उसकी इच्छा पूरण, माता हो जावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!
!! इतनी स्तुति निशदिन, जो नर भी गावे,
कहते सेवक ध्यानू, सुख संपति पावे,
जै वैष्णो माता, मैया जै वैष्णो माता !!


*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

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ओम जय अम्बे गौरी // Om Jai Ambe Gauri - Aarti | Lyrics in Hindi and English | Bhakti Songs


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ओम जय अम्बे गौरी
 Om Jai Ambe Gauri
  Aarti
Bhakti Songs

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी
तुम को निस दिन ध्यावत
मैयाजी को निस दिन ध्यावत
हरि ब्रह्मा शिवजी .
बोलो जय अम्बे गौरी ..

माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को
मैया टीको मृगमद को
उज्ज्वल से दो नैना चन्द्रवदन नीको
बोलो जय अम्बे गौरी ..

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर साजे
मैया रक्ताम्बर साजे
रक्त पुष्प गले माला कण्ठ हार साजे
बोलो जय अम्बे गौरी ..

केहरि वाहन राजत खड्ग कृपाण धारी
मैया खड्ग कृपाण धारी
सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी
बोलो जय अम्बे गौरी ..

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती
मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति
बोलो जय अम्बे गौरी ..

शम्भु निशम्भु बिडारे महिषासुर धाती
मैया महिषासुर धाती
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती
बोलो जय अम्बे गौरी ..

चण्ड मुण्ड शोणित बीज हरे
मैया शोणित बीज हरे
मधु कैटभ दोउ मारे सुर भय दूर करे
बोलो जय अम्बे गौरी ..

ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी
मैया तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी
बोलो जय अम्बे गौरी ..

चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों
मैया नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंग और बाजत डमरू
बोलो जय अम्बे गौरी ..

तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता
मैया तुम ही हो भर्ता
भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता
बोलो जय अम्बे गौरी ..

भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी
मैया वर मुद्रा धारी
मन वाँछित फल पावत देवता नर नारी
बोलो जय अम्बे गौरी ..

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती
मैया अगर कपूर बाती
माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती
बोलो जय अम्बे गौरी ..

माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे
मैया जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे
बोलो जय अम्बे गौरी ..


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

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श्री दुर्गा सप्तशती - अनुराधा पोडवाल //SHREE DURGA SAPTSHATI Sampadit by ANURADHA PAUDWAl


श्री दुर्गा सप्तशती 
- अनुराधा पोडवाल
 SHREE DURGA SAPTSHATI 
ANURADHA PAUDWAl




पूजनकर्ता स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएं, साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक सामने रखें। इन्हें अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दें। माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बांध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थ- काममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्परं कवचार्गलाकीलकपाठ- वेदतन्त्रोक्त रात्रिसूक्त पाठ देव्यथर्वशीर्ष पाठन्यास विधि सहित नवार्णजप सप्तशतीन्यास- धन्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च 'मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।' इत्याद्यारभ्य 'सावर्णिर्भविता मनुः' इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च किरष्ये/करिष्यामि।

इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें, योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं।

'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'

इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मंत्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है।
इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।' इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए, जो इस प्रकार है-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।'

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।'


इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥1॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥2॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥3॥
ॐ क्षुं धुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥4॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥5॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥6॥
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव॥7॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥8॥
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥9॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥10॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥11॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥12॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥13॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥16॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-
महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥18॥
इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥19॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥20॥
इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताए अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करें, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरंभ किया जाता है।

कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंग माने गए हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

जिस प्रकार सब मंत्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलक रूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिए। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

(इसके बाद देवी कवच का पाठ करना चाहिए।)

॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥

विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥3॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥4॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥13॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥15॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥23॥
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥27॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥44॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥45॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥48॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥52॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥
॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥

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