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27.6.16

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे mero man anat kaha sukh pave सूरदास का भजन




मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे,
  mero man anat kaha sukh pave ,



 सूरदास  का भजन,  

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै॥
कमल-नैन को छाँड़ि महातम, और देव को ध्यावै।
परम गंग को छाँड़ि पियासो, दुरमति कूप खनावै॥
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यो, क्यों करील-फल भावै।
'सूरदास' प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।