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Monday, May 16, 2016

अजब हैरान हूँ भगवन तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं Ajab Hairaan Hun Bhagwan


अजब  हैरान हूँ भगवन तुम्हें कैसे रिझाऊँ मैं
  Ajab Hairaan Hun Bhagwan



         
   भजन 

अजब हैरान हूं भगवन , तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...
कोई वस्तू नहीं ऐसी, जिसे सेवा में लाऊं मैं...


करूं किस तौर आवाहन, कि तुम मौजूद हो हर जां,
निरादर है बुलाने को, अगर घंटी बजाऊं मैं...
अजब हैरान हूं भगवन, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...
तुम्हीं हो मूर्ति में भी, और तुम्हीं व्यापक हो फूलों में,
भला भगवान पर भगवान को क्यों कर  चढाऊं मैं...
अजब हैरान हूं भगवन, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...
लगाना भोग कुछ तुमको, ये एक अपमान करना है,



खिलाता है जो सब जग को, उसे क्यों कर  खिलाऊं मैं...
अजब हैरान हूं भगवन, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...
तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं, सूरज, चांद और तारे,
महा अंधेर है कैसे, तुम्हें दीपक दिखाऊं मैं...
अजब हैरान हूं भगवन, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...
भुजाएं हैं, न सीना है, न गर्दन, है न पेशानी,
तू हैं निर्लेप नारायण, कहां चंदन लगाऊँ  मैं...
अजब हैरान हूं भगवन, तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं...