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2.4.16

मंगल भवन अमंगल हारी

मंगल भवन अमंगल हारी 

       Ram bhajan 

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रबहु सुदसरथ अचर बिहारी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम

हो, होइहै वही जो राम रचि राखा
हो, धीरज धरम मित्र अरु नारी
को करे तरफ़ बढ़ाए साखा

आपद काल परखिये चारी

सो तेहि मिलय न कछु सन्देहू
हो, जेहिके जेहि पर सत्य सनेहू

हो, जाकी रही भावना जैसी
राम सिया राम सिया राम जय जय राम
रघु मूरति देखी तिन तैसी

रघुकुल रीत सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाई

राम सिया राम सिया राम जय जय राम
हो, हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
कहहि सुनहि बहुविधि सब संता