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Sunday, March 27, 2016

गायत्री चालीसा Gayatri Chalisa

: श्री गायत्री चालीसा
 ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड ॥
 शान्ति कान्ति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखण्ड ॥ १॥
 जगत जननी मङ्गल करनि गायत्री सुखधाम । 
 प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम ॥ २॥ 
 भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी । गायत्री नित कलिमल दहनी ॥
 अक्षर चौविस परम पुनीता । इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता ॥
 शाश्वत सतोगुणी सत रूपा । सत्य सनातन सुधा अनूपा ॥
 हंसारूढ सितंबर धारी । स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी ॥
 पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला । शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला ॥
 ध्यान धरत पुलकित हित होई । सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई ॥ 
 कामधेनु तुम सुर तरु छाया । निराकार की अद्भुत माया ॥
 तुम्हरी शरण गहै जो कोई । तरै सकल संकट सों सोई ॥
 सरस्वती लक्ष्मी तुम काली । दिपै तुम्हारी ज्योति निराली ॥
 तुम्हरी महिमा पार न पावैं । जो शारद शत मुख गुन गावैं ॥

 
चार वेद की मात पुनीता । तुम ब्रह्माणी गौरी सीता ॥
 महामन्त्र जितने जग माहीं । कोउ गायत्री सम नाहीं ॥
 सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै । आलस पाप अविद्या नासै ॥
 सृष्टि बीज जग जननि भवानी । कालरात्रि वरदा कल्याणी ॥
 ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते । तुम सों पावें सुरता तेते ॥
 तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे । जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे ॥
 महिमा अपरम्पार तुम्हारी । जय जय जय त्रिपदा भयहारी ॥
 पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना । तुम सम अधिक न जगमे आना ॥
 तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा । तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा ॥ 
 जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई । पारस परसि कुधातु सुहाई ॥

 
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई । माता तुम सब ठौर समाई ॥
 ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे । सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे ॥ 
 सकल सृष्टि की प्राण विधाता । पालक पोषक नाशक त्राता ॥
 मातेश्वरी दया व्रत धारी । तुम सन तरे पातकी भारी ॥
 जापर कृपा तुम्हारी होई । तापर कृपा करें सब कोई ॥
 मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें । रोगी रोग रहित हो जावें ॥
 दरिद्र मिटै कटै सब पीरा । नाशै दुःख हरै भव भीरा ॥
 गृह क्लेश चित चिन्ता भारी । नासै गायत्री भय हारी ॥
 सन्तति हीन सुसन्तति पावें । सुख संपति युत मोद मनावें ॥
 भूत पिशाच सबै भय खावें । यम के दूत निकट नहिं आवें ॥




 जो सधवा सुमिरें चित लाई । अछत सुहाग सदा सुखदाई ॥ 
 घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी । विधवा रहें सत्य व्रत धारी ॥
 जयति जयति जगदंब भवानी । तुम सम ओर दयालु न दानी ॥
 जो सतगुरु सो दीक्षा पावे । सो साधन को सफल बनावे ॥
 सुमिरन करे सुरूचि बडभागी । लहै मनोरथ गृही विरागी ॥
 अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता । सब समर्थ गायत्री माता ॥॥
 ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी । आरत अर्थी चिन्तित भोगी ॥
 जो जो शरण तुम्हारी आवें । सो सो मन वांछित फल पावें ॥
 बल बुधि विद्या शील स्वभाउ । धन वैभव यश तेज उछाउ 
 सकल बढें उपजें सुख नाना । जे यह पाठ करै धरि ध्याना ॥
 यह चालीसा भक्ति युत पाठ करै जो कोई । 
 तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ॥

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