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12.9.10

तुम तजि और कौन पे जाऊं tum taji aur koun pe jaoon

सूरदास भजन 
गायक -अनूप जलोटा

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तुम तजि और कौन पे जाऊं
काकै द्वार जाई सिर नाऊं
पर हाथ कहां बिकाऊं...

ऐसो को दाता है समरथ
जाके दिये अघाऊं
अंतकाल तुम्हरो सुमि्रिन
गति अनत कहूं नहिं पाऊं....


रंक अयाची कियो सुदामा
दियो अभय पद ठाऊं
कामधेनु चिंतामणि दीन्हो
कल्पवृक्ष  तर छाऊं....

भव समुद्र अति देख भयानक
मन में अधिक डराऊं
कीजै कृपा सुमिरि अपनो पन
सूरदास बलि जाऊं.....

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मन फ़ूला फ़ूला फ़िरे जगत में कैसा नाता रे

माता कहे यह पुत्र हमारा,बहिन कहे बीर मेरा

भाई कहे यह भुजा हमारी,नारी कहे नर मेरा

पैर पकरि के माता रोवे,बांह पकरि के भाई

लपटि झपटि के तिरिया रोवै,हंस अकेला जाई

चारों कोना आग लगाई,फ़ूंक दिया जस होरी

हाड जरे जसलाकडी केस जरे जस घास

सोना जैसी काया जरि गई ,कोई न आया पास

कहत कबीर सुनो भई साधु एक नाम की आस।
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उमरिया धोखे में खोय दियो रे..

पांच बरस का भोला भाला

बीस में जवान भयो

तीस बरस में माया के कारण

देश विदेश गयो...उमर सब धोखे  में...

चालिस बरस अंत अब लागे,बाढै मोह गयो

धन धाम पुत्र के कारण ,निस दिन सोच भयो

बरस पचास कमर भई टेढी ,सोचत खाट  पर्यो।

लडका भी अब बोलन लाग्यो ,बूढा मर न गयो

बरस साठ -सित्तर के भीतर केस सफ़ेद भयो

वात, पित्त, कफ़ घेर लियो है ,नैननि नीर बह्यो

न हरि भक्ति न साधो की संगत

न शुभ कर्म कियो

कहे कबीर सुनो भई साधो ,चोला छूट गयो।
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मो को कहां ढूढे बंदे मै तो तेरे पास में

ना तीरथ में ना मूरत में ना एकांत निवास में

ना मंदिर मे ना मस्जिद में  ना काबा कैलाश  में

ना मैं जप में ना मैं तप में ,ना मैं व्रत-उपवास में।

ना ही क्रिया करम में रहता ना रहता सन्यास में

नाहिं प्राण में,नाहिं पिंड में ,ना ब्रह्मांड आकास में

ना मैं भृकुटि भंवर गुफ़ा में, सब श्वासन की श्वास में

कहत कबीर सुनो भई साधो मैं तो हूं विश्वास में।
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