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Saturday, September 11, 2010

दीनन दुख हरहूं देव!...भजन-surdas

दीनन दुख हरहूं देव!.
      surdas

संतन सुख कारी।
अजामिल ,गीध,व्याध
इनमें कहो कौन साध
पंछी हूं पद पढात
गनिका सी तारी।

ध्रुव के सिर छत्र देत
प्रहलाद कहुं उबार देत
भगत हेतु बांध्यो सेत
लंकापुरि जारी

तंदुल से रीझ जात
साग-पात सों अघात
शबरी के झूंठे फ़ल
खाटे,मीठे खारी।


गज को जब ग्रा्ह ग्रस्यो
दु:सासन चीर हर्यो
सभा बीच कृष्ण-कृष्ण द्रोपदी पुकारी
इतने में हरि आई गये
बसनन आरूढ भये
सूरदास द्वारे ठाडो आंधरो भिखारी।

3 comments:

  1. अति सुंदर भजन संगृह। आत्मा को सुकून मिलता है। आभार!

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  2. garibon kaa dukh bhagvaan hee haran karenge.achaa bhajan hai.aabhaar!

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  3. निश्चित ही सरहनीय कार्य

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